छात्र और अनुशासन पर निबंध | Student and Discipline Essay in Hindi


छात्र और अनुशासन पर निबंध | Student and Discipline Essay in Hindi Small


छात्र और अनुशासन पर निबंध : मनुष्य स्वभावतः निर्द्वन्द्व और निर्बन्ध रहना चाहता है । छोटे – से – छोटा बन्धन भी उसे खटकता है , पर सामाजिक जीवन की सुचारुता को बनाये रखने के लिए बन्धन या एक नियम आवश्यक हो जाता है ।

सामाजिक नियमों का पालन ही अनुशासन है । अनुशासनबद्धता ऐसा नियम है जिससे सभी का कल्याण होता है । अनुशासन हमारी सभ्यता का प्रथम सोपान है । यह हमारे सभ्य जीवन की आधारशिला है ।

यह हर वर्ग और हर सम्प्रदाय के लिए आवश्यक है । शक्ति का अपव्यय अनुचित है । यों तो जीवन के प्रत्येक प्रहर , प्रत्येक स्थल में अनुशासन की आवश्यकता होती , पर सबसे महत्त्व है उसका छात्र – जीवन में ।

प्रकृति का रोम – रोम अनुशासन में आबद्ध एक निश्चित गतिचक्र में निरन्तर नाचता हुआ अविराम – अबाध रहता है । चाँद , सूरज और सितारे अनुशासनबद्ध होकर नियत समय पर अपना अपना कार्य संपादित करते हैं ।

छात्र – जीवन तो साधना का जीवन है , अतः आवश्यक है कि वे नियम और विवेक – संगत श्रृंखला में बँधे रहने की आदत डाले । यदि छात्र अनुशासनबद्ध जीवन के पाबन्द बन सकें तो देश के भविष्य का निर्माण विद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में होता रहे । आज के विद्यार्थी कल के नेता होते हैं । अनुशासन को मूलमंत्र मानकर ही विद्यार्थी अपने जीवन के उद्देश्य में सफल हो सकते हैं तथा देश की उन्नति का कार्य कर सकते हैं ।

वे ही तो देश की भावी आशा हैं । आज विद्यार्थियों के बीच अनुशासनहीनता की भावना बढ़ रही है । आये दिन अध्यापकों से झगड़ना , साथ पढ़ने वाली बालिकाओं से छेड़खानी करना , नागरिकों से बेमतलब उलझ पड़ना , अपनी संगठित शक्ति से शहर में दहशत फैला देना छात्रों का गोरख – धन्धा बन गया है ।

आज के अधिकांश छात्र उच्छंखल , विवेकहीन , उदंड एवं चरित्र – भ्रष्ट , अनुशासन का विरोध करने वाले , निरंकुश और असामाजिक व्यवहारों के व्रती बन गये हैं । सामयिक समाचार – पत्रों में उनकी अनुशासनहीनता की काफी चर्चा रहती है ।

आज अनुशासनहीनता हिरण की भाँति छलाँगें मारती हुई , शिक्षा की हरी – भरी फुलवारी को रौंदती बढ़ी जा रही है । रेल या बस में बिना टिकट यात्रा करना , तोड़ – फोड़ करना , हुड़दंग मचाना , अपने अभिभावकों और गुरुजनों का अनादर करना , परीक्षा में कदाचार करना आदि आज के छात्र अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं । उनकी यह प्रवृत्ति समाज और राष्ट्र के लिए अत्यन्त घातक है ।

हमें अनुशासन के महत्त्व को छात्र – जीवन में प्रतिष्ठित करना है । हमें उन्हें बताना है कि अनुशासन में बंधा हुआ जीवन पिंजड़े में कैद किसी पक्षी का रुद्ध – क्षुब्ध जीवन नहीं होता ।

अनुशासन सद्भावों का प्रेरक , विनय और शील का स्रष्टा , साधना का सखा और निरंकुश स्वेच्छाचार का शत्रु होता है । ‘ अनुशासन ‘ ‘ प्रेरणा से लेकर सृजन ‘ तक की श्रृंखला का देवता होता है ।


विद्यार्थी और अनुशासन पर निबंध | Student and Discipline Essay in Hindi


  • विचार बिंदु
    1. भूमिका
    2. छात्रजीवन में अनुशासन का महत्त्व / अनुशासन का महत्त्व
    3. अनुशासनहीनता के कारण / अनुशासन के अभाव में उच्छृखलता
    4. सुधार के उपाय
    5. उपसंहार

भूमिका


जीवन को आनंदपूर्वक जीने के लिए विद्या और अनुशासन दोनों आवश्यक हैं । विद्या का अंतिम लक्ष्य है – इस जीवन को मधुर तथा सुविधापूर्ण बनाना । अनुशासन का भी यही लक्ष्य है । अनुशासन भी एक प्रकार की विद्या है । अपनी दिनचर्या को , अपनी बोल – चाल को , अपने रहन – सहन को , अपने सोच – विचार को , अपने समस्त व्यवहार को व्यवस्थित करना ही अनुशासन है ।

एक अनपढ़ गँवार व्यक्ति के जीवन में क्रम और व्यवस्था नहीं होती , इसीलिए उसे असभ्य , अशिक्षित कहा जाता है । पढ़े – लिखे व्यक्ति से यही अपेक्षा की जाती है कि उसका सबकुछ व्यवस्थित हो । अत : अनुशासन विद्या का एक अनिवार्य अंग है ।


छात्रजीवन में अनुशासन का महत्त्व / अनुशासन का महत्त्व


विद्यार्थी के लिए अनुशासित होना परम आवश्यक है । अनुशासन से विद्यार्थी को सब प्रकार का लाभ ही होता है । अनुशासन अर्थात् निश्चित व्यवस्था से समय और धन की बचत होती है । जिस छात्र ने अपनी दिनचर्या निश्चित कर ली है , उसका समय व्यर्थ नहीं जाता ।

वह अपने एक – एक क्षण का समुचित उपयोग उठाता है । वह समय पर मनोरंजन भी कर लेता है तथा अध्ययन भी पूरा कर पाता है । इसके विपरीत अनुशासनहीन छात्र आज का काम कल पर और कल का काम परसों पर टालकर अपने लिए मुसीबत इकट्ठी कर लेता है ।


अनुशासनहीनता के कारण / अनुशासन के अभाव में उच्छृखलता


आज भारत के जन – जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनुशासनहीनता दृष्टिगोचर हो रही है । विद्यार्थी की रुचि पढ़ाई की ओर नहीं है । अनुशासनहीनता के कारण है – आज का विद्यार्थी साज – शृंगार , सुख – आराम की इच्छा । दूसरी बात माता – पिता द्वारा अच्छी तरह ध्यान नहीं देना , खराब संगत ।


सुधार के उपाय


अनुशासन का गुण बचपन में ही ग्रहण किया जाना चाहिए । इसलिए इसका संबंध छात्र से है । विद्यालय की सारी व्यवस्था में अनुशासन और नियमों को लागू करने के पीछे यही बात है । यही कारण है कि अच्छे अनुशासित विद्यालयों के छात्र जीवन में अच्छी सफलता प्राप्त करते हैं ।

अनुशासन हमारी अस्त – व्यस्त जिंदगी को साफ – सुथरी तथा सुलझी हुई व्यवस्था देता है । इसके कारण हमारी शक्तियाँ केंद्रित होती हैं । हमारा जीवन उद्देश्यपूर्ण बनता है तथा हम थोड़े समय में ही बहुत काम कर पाते हैं ।

अनुशासन ही छात्र को सही दिशा दिखलाता है छात्रों को अनुशासनप्रिय होना अत्यन्त आवश्यक है , क्योंकि अनुशासन ही छात्र को सही दिशा दिखला सकता है ।

शिक्षकों और गुरुजनों के अनुशासन में रहकर ही छात्र समुचित रीति से विद्या ग्रहण करते हैं और अपने चरित्र को उन्नत बनाते हैं । छात्र अनुशासन की संस्कृति से लाभान्वित होकर ही विश्व में अपने यश की सुगन्ध फैला सकते हैं


उपसंहार


अनुशासन का अर्थ बंधन नहीं है । उसका अर्थ है -व्यवस्था । हाँ , उस व्यवस्था के लिए कुछ अनुचित इच्छाओं से छुटकारा पाना पड़ता है । उनसे छुटकारा पाने में ही लाभ है ।

छात्र यदि सभ्य बनने के लिए अपनी गलत आदतों पर रोक लगाते हैं , तो वह लाभप्रद ही है । अतः अनुशासन जीवन के लिए परमावश्यक है तथा उसकी प्रथम पाठशाला है – विद्यार्थी जीवन ।


दोस्तो इस निबंध को आपके स्कूल और कॉलेज या बोर्ड एग्जाम के सिलेबस को देखते हुए , लिखा गया है , अगर आप इसका इस्तेमाल अपने किसी हिंदी प्रोजेक्ट में करना चाहे तो आपको काफी मदद मिलेगी। और हम आशा करते है , कि आज के इस लेख को पढ़कर आपको अच्छा लगे।


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