एसिडिटी क्या है इसके लक्षण , कारण , उपचार। Acidity in Hindi

एसिडिटी क्या है ? what is acidity

( एसिडिटी ) अम्लपित्त का शाब्दिक अर्थ है – अम्ल + पित्त अर्थात पित्त में खट्टेपन की उपस्थिति । हमारे शरीर में वात – पित्त और कफ जब साम्य अवस्था में होते हैं ; तब वे धातु कहलाते हैं

अर्थात शरीर को धारण करने योग्य होते हैं , परंतु जब इनका संतुलन बिगड़ जाता है ; जब वे कुपित हो जाते हैं ; तब वात – पित्त – कफ दोष कहलाते हैं । जब पित्त – विकार पैदा होता है या पित्त कुपित हो जाता है ; तब वह अम्ल रस हो जाता है ; तब इसे अम्लपित्त कहते हैं ।

इस रोग में बेचैनी , घबराहट , गले में जलन , खट्टी डकारें आना , हाथ – पैरों के तलवों में जलन होना , कब्ज होना , अपच , गैस , सिरदरद तथा दस्त के सामान्य रूप से लक्षण देखने को मिलते हैं । जब यह रोग बढ़ जाता है ; तब पेप्टिक अल्सर या ड्यूडेनियम अल्सर भी हो सकता है । रोग बढ़ने पर भोजन करने के तुरंत बाद उलटी हो जाती है ।

आयुर्वेद के अनुसार एसिडिटी के तीन प्रकार होते हैं

  1. वात प्रधान – आँखों के सामने अँधेरा छा जाना , शरीर के अंगों में कंपन होना , शरीर के किसी भी भाग में दरद होना , बेहोशी होना , अज्ञानता , विपरीत ज्ञान का होना । रोना या बिना कारण हँसना , चक्कर आना , मोह , रोमांच ।
  2. पित्त प्रधान – सिरदरद , भ्रम , मूर्छा , ( बेहोशी ) , अरुचि , आलस्य , लार में मिठास इत्यादि ।
  3. कफ प्रधान – मानसिक निराशा , अरुचि , मुख में कफ का एहसास होना , भूख की कमी , त्वचा में खुजली , नींद आना , काम करने में मन न लगना ।

एसिडिटीन (Acidity) से 40 प्रकार के विकार पैदा होते हैं ।

  1. शरीर के सभी अंगों में जलन ।
  2. शरीर के किसी एक स्थान पर जलन ।
  3. पूरे शरीर में तेज गरमी का एहसास ।
  4. नेत्र आदि इंद्रियों में जलन , हृदय की धड़कन अनियमित होना ।
  5. गैस उठना ।
  6. आंतरिक जलन , हृदय शूल , खट्टी डकारें ।
  7. हाथ – पैरों में विविध प्रकार की जलन ।
  8. आँतों में जलन ।
  9. किसी विशेष अवयव में जलन ।
  10. शारीरिक तापमान में वृद्धि होना ।
  11. पसीना अधिक आना ।
  12. किसी अंग विशेष में अधिक पसीना ।
  13. किसी विशेष प्रकार की गंध का आना ।
  14. किसी अंग में टूटने के समान दरद होना ।
  15. रक्त पतला , काला , दुर्गंधमय होना ।
  16. मांस का काला दुर्गंधमय होना ।
  17. बाहरी त्वचा में जलन ।
  18. मांस में जलन ।
  19. बाहरी त्वचा का फटना ।
  20. त्वचा के विभिन्न विकार ।
  21. खून के चकत्ते उठना ।
  22. रक्तपित्त व्याधि ( नकसीर , शीतपित्ती , खूनी बवासीर , रक्तप्रदर इत्यादि ) ।
  23. शरीर पर गोल लाल मंडल बनना ।
  24. शरीर का हरा – पीला रंग हो जाना ।
  25. शरीर का हलदी के समान रंग हो जाना ।
  26. मुँह पर नीले दाग होना ।
  27. काँखबिलाई होना ( बगल में मांस फटना ) ।
  28. पीलिया होना ।
  29. मुँह का स्वाद कडुआ रहना ।
  30. मुख से दुर्गंध आना ।
  31. प्यास का बढ़ना ( तृषा ) ।
  32. भोजन अधिक कर लेने पर भी अतृप्त रहना ।
  33. मुख में छाले पड़ना ।
  34. गले में छाले होना ।
  35. आँखों का पकना ।
  36. गुदा का पकना ।
  37. मूत्रंद्रिय का पकना ।
  38. रक्त का स्राव होना ।
  39. चक्कर आना , अंधकार का आभास ।
  40. आँखें , मूत्र – मल हरा – नीला हो जाना । उपरोक्त लक्षणों से पित्त विकार जाना जाता है ।
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एसिडिटी के लक्षण

आमाशय में प्रोटीन के पाचन के लिए हाइड्रोक्लोरिक अम्ल का स्राव होता है ; जब वह अधिक सांद्र ( तीव्र ) हो जाता है ; तब एसिडिटी ( हाइपर एसिडिटी ) के लक्षण दिखाई देते हैं

उदर में भारीपन , मुख में खट्टा पानी आना , सिर में पीड़ा , पेट फूलना , आँतों में आवाज होना , कंठ एवं छाती में जलन होना , रोंगटे खड़े होना अम्लपित्त के सामान्य लक्षण हैं ।

एसिडिटी के कारण

अम्लपित्त के कारण आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने भी स्वीकार किया है कि ईर्ष्या , द्वेष , चिंता , भय , तनाव , क्रोध , मानसिक श्रम तथा गरिष्ठ , बासी , खट्टे , नमकीन पदार्थों का सेवन , भोजन में गरम मसालों का अधिक प्रयोग , तले – भुने खाद्यों का सेवन करने से इस रोग की उत्पत्ति होती है ।

( 1 ) जल्दबाजी । भोजन करते समय ठीक से न चबाना तथा मन में सदैव उतावलापन ( जल्दबाजी ) होने से यह रोग पैदा होता है ।

( 2 ) चिंता करना । चिंता निरंतर करने से हमारे शरीर के अनैच्छिक संस्थान पर बुरा प्रभाव पड़ता है । जिससे शारीरिक कार्यप्रणाली अस्त – व्यस्त हो जाती है । अशांत मन से तनाव होता जो क्रोध एवं उत्तेजना बढ़ाता है ।

( 3 ) अधिक मिर्च – मसालों का प्रयोग । पेट में अम्लता को ये मसाले बढ़ाते हैं । इसी कारण अम्लपित्त रोग पैदा हो जाता है । गरम मसालों से लिवर की कार्यविधि पर बुरा असर पड़ता है । एक बार भोजन करने के तीन घंटे से पूर्व भोजन न करें तथा छह घंटे से अधिक देरी न हो ।

अन्य कारण भी हैं जैसे

  • भोजन के समय पानी पीने से ।
  • भोजन करते समय बातचीत करने से ।
  • भोजन के समय मन को शांत न रखने से ।
  • भोजन के तुरंत बाद पानी पीने से ।
  • अनेक प्रकार के , अनेक स्वाद के व्यंजन एक साथ खाने से ।
  • भोजन के साथ नीबू का सेवन करने से ।
  • भोजन खड़े – खड़े करने से ।
  • भोजन कम समय में जल्दी – जल्दी करने से ।
  • भोजन के समय अखबार या पुस्तक पढ़ने या टीवी देखते हुए भोजन करने से ।
  • खट्टे और दाहकारक ( जलन करने वाले ) पदार्थों का सेवन ।
  • फास्ट फूड , जंक फूड , पूरी – पराँठे , कचौड़ी , समोसा , नमकीन आदि का अधिक सेवन करने से अम्लता बढ़ती है ।

एसिडिटी के प्राकृतिक उपचार

  1. आँवलों का सेवन भोजन के साथ या औषध के रूप से करना अम्लपित्त रोगी के लिए अधिक हितकर है ।
  2. छिलका रहित जौ , अड़सा और आँवले का क्वाथ बना उसमें दालचीनी , तेजपात , इलायची और शहद मिलाकर पिलाने से अम्लपित्तजनित वमन तत्काल नष्ट होती है ।
  3. मिर्च – मसालों का कम – से – कम प्रयोग करें । सब्जियों में कच्चे पपीता की सब्जी , लौकी , तुरई , गिलकी , टिंडा , बथुआ इत्यादि की सब्जी उत्तम पथ्य है ।
  4. अंकुरित अनाज , ताजे मीठे फल , गाजर का रस , सलाद तथा दूध , गोघृत का सेवन करें ।
  5. छिलका सहित मूंग की दाल , पुराना शालि ( तैलीय ) चावल , चोकरयुक्त आटे की रोटी का सेवन करना चाहिए ।
  6. भोजन ताजा हो , लेकिन अधिक गरम तथा अधिक ठंढा भी न हो ।
  7. अधिक मात्रा में कार्बोहाइड्रेट युक्त भोजन । मल – मूत्रादि के वेगों को रोकना ।
  8. भोजन के साथ नीबू का प्रयोग न करें ।
  9. नया अन्न , तिल एवं खट्टे दही का प्रयोग न करें ।
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इस रोग में जल्दी चिकित्सा प्रारंभ करनी चाहिए , अधिक समय व्यतीत हो जाने पर रोग कष्टसाध्य अथवा असाध्य – सा हो जाता है । एलोपैथिक चिकित्सा में अम्लरोधी ( एंटासिड ) देते हैं , परंतु प्रतिक्रियास्वरूप रोग में तुरंत लाभं तो होता है , स्थायी लाभ नहीं होता है । आहार – विहार , पथ्य – परहेज का पूरा ध्यान रखकर आसानी से धैर्यपूर्वक मन को शांत रखकर घरेलू चिकित्सा से इस रोग पर पूर्णतः काबू पाया जा सकता है ।

एसिडिटी के घरेलू उपचार

  1. अमलतास फल की मज्जा 5 ग्राम एक गिलास पानी में उबालकर काढ़ा बनाकर दें ।
  2. कैस्टर ऑयल ( अरंडी का मेडिकेटेड तेल ) 10 से 20 ग्राम लेकर गरम पानी या दूध में मिलाकर शाम को सोते समय दें ।
  3. रात को हरड़ ( हरीतकी ) चूर्ण 3 ग्राम गरम पानी से दें ।
  4. बेल का शरबत बनाकर दिन में 2 बार दें ।
  5. बिल्व चूर्ण 3 ग्राम , ताजे दही में बूरा या मिसरी के साथ दें ।
  6. मुलेठी चूर्ण , आँवला ( आमलकी ) चूर्ण बराबर मात्रा में मिलाकर 3 ग्राम चूर्ण शहद के साथ प्रातः – सायं खाली पेट चटाएँ ।
  7. 3-3 घंटे के अंतर से ठंढा किया मीठा दूध धीरे – धीरे पिलाएँ ।
  8. 2 ग्राम गिलोय चूर्ण को शहद के साथ चटाएँ ।
  9. भोजन के बाद हरड़ का चूर्ण शहद या मुनक्का के साथ सेवन कराएँ ।
  10. नारियल की गिरी को जलाकर भस्म बनाकर रखें तथा 3-3 ग्राम दिन में 2 बार पानी केसाथ देने से लाभ होता है ।
  11. प्रात : नाश्ते में दूध के साथ 1-2 पके केला मिलाकर खिलाने से लाभ होता है ।
  12. प्रात : -सायं नित्य 50 ग्राम मुनक्का ( 10 घंटे पानी में भिगोए हुए ) सेवन कराएँ तथा मुनक्का जिस पानी में भिगोएँ , उस पानी को भी पिलाएँ । मुनक्का का बीज न खाएँ । मुनक्का 50 ग्राम और सौंफ 5 ग्राम ( दोनों को जौकुट कर ) 200 ग्राम पानी में रात्रि को भिगो दें । सुबह मसल – छानकर 10 ग्राम मिसरी मिलाकर पीने से अम्लपित्त में लाभ होता है ।
  13. प्रात : मीठे फल जैसे – खजूर , छुआरे , मुनक्का , अंजीर , चीकू , केला ( खूब पका हुआ चित्तीदार हो । ) , मीठे आम , अनार , सीताफल , तरबूज खरबूजा आदि मीठे फल ।
  14. मीठे संतरे का रस , जीरा 2 ग्राम भुना हुआ तथा सेंधानमक मिलाकर पीने से लाभ होता है ।
  15. नारियल का पानी लाभप्रद होता है ।
  16. भोजन के बाद छोटी बाल हरड़ को मुख में रखकर चूसना चाहिए ।
  17. सौंफ को थोड़ा भून ( सेंक ) लें तथा बराबर मात्रा में मिसरी मिलाकर चूर्ण बनाकर भोजन के बाद 3 ग्राम चूर्ण मुख में रखकर चूसते रहें ।
  18. त्रिफला एवं कुटकी का चूर्ण बराबर मात्रा में मिसरी या शहद मिलाकर सेवन कराएँ ।
  19. ईसबगोल की भूसी 50 ग्राम में अविपत्तिकर चूर्ण 50 ग्राम मिलाकर रखें तथा यह मिश्रण 10 ग्राम दोपहर व रात्रि को भोजन के बाद गाय के उबले हुए ठंढे मीठे दूध में मिलाकर लाभ होने तक प्रतिदिन सेवन कराएँ ।
  20. नित्य 5 ग्राम खाने का चूना रात को पानी में घोलकर रख दें । प्रात : 10 ग्राम चूने का पानी निथारकर दूध में मिलाकर लाभ होने तक पिलाएँ ।
  21. पिप्पली का चूर्ण 3 ग्राम मिसरी के साथ नित्य सुबह – शाम 40 दिनों तक सेवन करने से लाभ होता है ।
  22. मिसरी के साथ नारियल 10-20 ग्राम नित्य खाने से लाभ होता है ।
  23. इलायची 1 नग तथा लौंग 1 नग भोजन के बाद चबाने से लाभ होता है ।
  24. भोजन के पूर्व तथा बाद में 1-1 चम्मच जैतून का तेल ( ओलिव ऑइल ) पीने से लाभ होता है
  25. प्राकृतिक आरोग्य केंद्रों में जहाँ पर ‘ दुग्धकल्प ‘ कराया जाता है ; 50 दिनों तक उपचार लेने से रामबाण के समान लाभ होता है ।
  26. गिलोय , नीम के पत्ते और कडुए परवल के पत्ते समान मात्रा में लें इकट्ठा पीसकर शहद मिलाकर दिन में दो बार देने से अम्लपित्त में लाभ होता है ।
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अंतिम शब्द

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Update on June 1, 2021 @ 7:08 am

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