Durga puja Par Nibandh – दुर्गा पूजा पर हिंदी निबंध

Durga puja Par Nibandh – दुर्गा पूजा पर हिंदी निबंध

Durga puja भारत में अनेक पर्व – त्योहार मनाये जाते हैं । इसीलिए भारत को पर्यों का देश भी कहा जाता है । इन पर्यों में विजया दशमी का अपना अलग स्थान है । यह क्षत्रियों का पर्व है । इस पर्व को कोई विजया दशमी और कोई दशहरा के नाम से अभिहित करता है । किन्तु ‘ नदियां एक घाट बहुतेरे ‘ वाली कहावत इस संदर्भ में चरितार्थ होती है । इस पर्व के सम्बन्ध में अनेक कथाएँ प्रचलित हैं ।

इस दिन कोई रावण पर राम की विजय का दिवस मानता है तो कोई महिषासुर का दुर्गा द्वारा संहार का दिवस । विजया दशमी के पावन दिन देवराज इन्द्र ने महादानव वृत्रासुर पर विजय प्राप्त की थी । इसी दिन वीर पांडवों ने अपनी अज्ञातवास की अवधि समाप्त कर द्रौपदी का वरण किया था । महाभारत युद्ध भी विजया दशमी को आरंभ हुआ था ।

” लंका जीत राम घर आए , घर – घर मंगल मोद बधाए । ” दशहरा पर्व आश्विन शुक्ल पक्ष दशमी तिथि को मनाया जाता है । इससे पूर्व नौ दिन इसकी पृष्ठभूमि में जगदम्बा की पूजा , अर्चना की जाती है , क्योंकि इन्हीं दिनों आसुरी प्रवृत्तियों को देवी ने नष्ट – भ्रष्ट किया था ।

इस देवी को अनेक नामों से अभिहित किया गया है । कात्यायनी , गौरी , काली , . शिवा , रूद्राणी , सर्वमंगला , चण्डिका , अम्बिका एवं ताराचण्डी इत्यादि । हमारे देश में दशहरा में दुर्गा की प्रतिमा भारत माँ की प्रतिमा का प्रतीक है । कहा जाता है कि इन दिनों नीलकंठ पक्षी का दर्शन शुभ माना जाता है ।

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कुल्लु तथा पश्चिम बंगाल का दशहरा विशेष रूप से प्रसिद्ध है । दिल्ली , उत्तर प्रदेश , मध्य प्रदेश , बिहार और पंजाब आदि राज्यों में यह त्योहार सामान्यतः एक प्रकार से मनाया जाता है ।

इस तरह दुर्गापूजा बुराई पर अच्छा की , असुरों पर सुरों की , राक्षसों पर महाशक्ति की , असत्य पर सत्य की और अधर्म पर धर्म की विजय के रूप में मनाई जाती है । यह उत्सव हमें शिक्षा देती है कि अन्याय , अत्याचार , दुराचार को सहन करना महापाप है । इनकी पूजा से लोगों में उत्साह और साहस का संचार होता है ।

यह त्योहार एकता का पाठ और विश्व – बन्धुत्व की भावना को बढ़ावा देता है । साथ ही राम का आदर्श हमारे सामने रखकर हमें प्रेरित करता है कि शत्रुओं और अत्याचारों का समूल नाश किया जाना चाहिए । हम सब आपसी वैर – भाव भूलकर एक दूसरे की मंगल कामना करें तभी विजयादशमी की सार्थकता होगी ।

Durga puja Par Nibandh

भारतीय संस्कृति के पर्व – त्योहार , माला में मोतियो की भांति पिरोये हुए है । उन्हें उनसे पृथक् नहीं किया जा सकता । प्रत्येक उत्सव अपना धार्मिक , सामाजिक और ऐतिहासिक समत्व रखता है ।

आश्चर्य की बात है कि पर्व – त्योहार भी जाति के आधार पर बांटे गये है और विजयादशमी क्षत्रियों के हिस्से में आयी , परन्तु हिन्दू संस्कृति में ऐसा कोई उत्सव नहीं जिसे समस्त जातियाँ समान रूप से न मनाती हो ! अन्य पदों की भाँति विजयादशमी हिन्दुओ का प्रमुख पर्व है ।

भारतीय जनता अनुराग और उल्लास भरे हृदय से इसका स्वागत करती है । युग – युग से यह पर्व हिन्दू जनता में नवीन आशा , नवीन उत्साह और नव जागृति का संचार करता हुआ पुण्य एवं धर्म को विजय की घोषणा करता आ रहा है । इस पुण्य पर्व के साथ अनेक धार्मिक कथाएँ सम्बन्धित है । एक कथा के अनुसार , इसी पुण्य तिथि को श्रीराम ने रावण का संहार करके विजय प्राप्त की थी । अतः इसे विजय दशमी ‘ कहते है ।

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विजया दशमी के दिन रावण , मेघनाद और कुम्भकर्ण के शरीर के पुतले बनाकर जलाते है । इस प्रकार हम विजया दशमी के पुण्य पर्व को श्रीरामचन्द्र की विजय और दानवी शक्ति की पराजय के रूप में मनाते है । इस उत्सव के साथ एक और भी पौराणिक कथा है ।

महिषासुर दैत्य के अत्याचारो से समस्त सृष्टि में कुहराम मचा था । देवता भी कंपित हो उठे । त्रिदेवों ( ब्रह्मा , विष्णु , महेश ) एवं समस्त देवताओं के सम्मिलित तेज से महाशक्ति दुर्गा प्रकट हुई । उन्होंने अपने अतुल पराक्रम से महिषासुर का नाश कर भयत्रस्त देवताओं की रक्षा की । उसी दैवी शक्ति की विजय – स्मृति के रूप में हम इस पर्व को मनाते है । आश्विन शुक्लपक्ष प्रतिपदा से नवरात्र प्रारम्भ होता है ।

उसी दिन से दुर्गा सप्तशती का पाठ होने लगता है । नवरात्र में प्रतिपदा से लेकर नवमी तक दुर्गाजी की विशेष पूजा होती है । नवमी के दिन हवन होता है । रात्रि में जागरण होता है और घर – घर में देवी के गीत गाये जाते है । यह पर्व हमारी और हमारे देश की सांस्कृतिक एकता का आधार है और अनेकता में एकता , विषमता में समता की नीव है । यह दानवत्व पर देवत्व की . असत्य पर सत्य की तथा पाप पर पुण्य की विजय का सन्देश देता हुआ प्राणी – प्राणी में नवचेतना जागृत करता है ।

यह हमें शिक्षा देता है कि अन्याय , अत्याचार और दुराचार को सहन करना पाप है । इनका जड़ – मूल से नाश अवश्यम्भावी है । अब हम स्वतन्त्र राष्ट्र के नागरिक है । हमे अपनी पुरातन दूषित परम्पराएँ समाप्त कर देनी चाहिए । देवी माँ तो श्रद्धा और अनन्य भक्ति से प्रसन्न होती है न कि निरीह पशुओं की बलि देने से ।

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विजयादशमी हमे पवित्र संदेश देती है कि जीवन में समत्व स्थापित कर तभी जीवन सुखी और शान्त हो सकता है । पारस्परिक ईर्ष्या को भूलकर एक – दूसरे को गले लगाना चाहिए । समाज में सहानुभूति और समवेदना का संचार करना चाहिए । हमारा कर्तव्य है कि अपने इन शुभ पवों से शिक्षा ग्रहण करे और उत्सवों का आयोजन कर गौरव की वृद्धि करे

Update on May 12, 2021 @ 6:54 am

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