Knowledge Story In Hindi – ज्ञानवर्धक कहानी

Knowledge Story In Hindi – ज्ञानवर्धक कहानी

गुरु और शिष्य की कहानी

प्राचीन काल में गुरु अपने शिष्यों को विद्याध्ययन के साथ – साथ अनुशासन , शिष्टाचार , क्षमाशीलता , धैर्य आदि सद्गुणों की भी शिक्षा दिया करते थे । उस समय यह विश्वास था कि विद्या के समान ही चरित्र भी आवश्यक है और उसके विकास पर भी पूरा – पूरा ध्यान दिया जाना चाहिए ।

ऋषि धौम्य के आश्रम में कितने ही छात्र पढ़ते थे । वे उन्हें पूरी तत्परता के साथ पढ़ाते , साथ ही सद्गुणों की वृद्धि हुई कि नहीं , इसकी परीक्षा भी लेते रहते थे ।

एक दिन मूसलाधार वर्षा हो रही थी । गुरु ने अपने छात्र आरुणि से कहा- बेटा ! खेत में मेढ़ टूट जाने से पानी बाहर निकला जा रहा है । तुम जाकर उसे बाँध आओ ।

आरुणि तत्काल उठ खड़ा हुआ और खेत की ओर चल दिया । पानी का बहाव तेज था , इसलिए आरुणि रुका नहीं । कोई उपाय न देख वह स्वयं उस स्थान पर लेट गया । इस प्रकार पानी रोके रहने में उसे सफलता मिल गयी । बहुत रात बीत जाने पर भी जब वह न लौटा तो ऋषि धौम्य को उसकी चिंता हुई ।

वे अन्य शिष्यों को साथ में लेकर उसे खेत पर ढूँढने पहुँचे । देखा तो छात्र पानी को रोके मेढ़ के पास पड़ा है । बहुत देर तक ठंढा पानी जाने के कारण वह अचेत हो गया था ।

ऋषि धौम्य उसे उठाकर वापस आश्रम लाए । उसका समर्पण देखकर उनकी आँखें भर आयीं । उन्होंने उसको स्वास्थ्य लाभ कराने के उपरांत अपने गले लगाया और बोले- वत्स ! तुहारा समर्पण प्रशंसनीय है । आज से तुम उद्दालक के नाम से जाने जाओगे । आरुणि के समर्पण की कथा आज भी अनेको के लिए प्रेरणा का कार्य करती है ।

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इंसानियत का पैगाम

एक आदमी ने चिड़िया के बच्चे पकड़े और दरी में लपेट दिए । चिड़िया तड़पी । आदमी ने दरी को खोला तो चिडिया उन बच्चों से लिपट गई । आदमी ने चिड़िया को भी बच्चों सहित दरी में बाँध लिया ।

इन्हें लेकर वह हजरत के पास पहुँचा और पूछा- ‘ इन परिन्दों का क्या करूँ ? ‘ रसूलिल्लाह ने कहा- ‘ ऐ नेकबत ! रहम करना सीख और इन्हें वहीं छोड़कर आ जहाँ से इन्हें पकड़ा है ।

ऐ इनसान ! आज जिस बेरहमी का इस्तेमाल तू परिन्दों के लिए कर रहा है वही बेरहमी अपनी कौम के साथ भी बरतने लगेगा । रहम सीख तो ही इनसानियत बचेगी , इनसानियत न बची तो इनसान भी न बचेगा । ‘ वास्तव में मनुष्य अपने नियन्ता से भी चालाकी करके अपने हिस्से में दुर्भाग्य को बुला बैठा है ।

साहस

एक था राक्षस । उसने एक आदमी को पकड़ा ।

उसको उसने खाया नहीं , डराया भर और बोला- ‘ मेरी मर्जी के कामों में निरन्तर लगा रह , यदि ढील की तो खा जाऊँगा । ‘ वह आदमी जब तक बस चला तब तक काम करता रहा ।

जब थक कर चूर – चूर हो गया और जब काम सामर्थ्य से बाहर हो गया तो उसने सोचा कि तिल – तिल कर मरने से तो एक दिन पूरी तरह मरना अच्छा । उसने राक्षस से कह दिया- ‘ जो मर्जी हो सो करें , इस तरह मैं नहीं करते रह सकता । ‘ राक्षस ने सोचा कि काम का आदमी है ।

थोड़ा – थोड़ा काम बहुत दिन करता रहे तो क्या बुरा है ? एक दिन खा जाने पर तो उस लाभ से हाथ धोना पड़ेगा जो उसके द्वारा मिलता रहता है ।

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राक्षस ने समझौता कर लिया और खाया नहीं , थोड़ा – थोड़ा काम करते रहने की बात मान ली । कथासार यही है- ‘ हममें ‘ न ‘ कहने की भी हिम्मत होनी चाहिए । गलत का समर्थन नहीं करूँगा , उसमें सहयोग नहीं दूंगा । जिसमें इतना भी साहस न हो तो उसे सच्चे अर्थों में मनुष्य नहीं माना जा सकता ।

धूर्त गीदड़ और बकरी

एक दिन एक गीदड़ गड्ढे में गिर गया । बहुत उछलकूद की , परंतु बाहर न निकला सका । अंत में हताश होकर सोचने लगा कि अब इसी गड्ढे में मेरा अंत हो जाना सुनिश्चित है ।

तभी एक बकरी को मिमियाते हुए सुना । तत्काल ही गीदड़ की कुटिलता जाग उठी । वह बकरी से बोला- यहाँ अंदर खूब हरी – हरी घास और मीठा – मीठा पानी है । आओ , जी भरकर खाओ और पानी पीओ । बकरी गड्ढे में कूद गयी ।

चालाक गीदड़ बकरी की पीठ पर चढ़कर गड्डे से बाहर निकल आया और हँस कर बोला- तुम बड़ी बेवकूफ हो , मेरी जगह खुद गड्ढे में मरने के लिए आ गयी । बकरी बड़ी सरल भाव से बोली- गीदड़ भाई , मैं परोपकार का मूल्य समझती हूँ । मेरी उपयोगिता समझ कर कोई न कोई मुझे निकाल ही लेगा , पर तुम्हारी कुटिलता के कारण तुहारी सहायता कौन करता ?

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Update on July 10, 2021 @ 3:57 am

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