सकरात्मक सोच कैसे बनाये – Positive Thinking In Hindi

सकरात्मक सोच कैसे बनाये – Positive Thinking In Hindi

विचारों में भी बहुत शक्ति होती है , हालाँकि कुछ लोग इस तथ्य से परिचित न होने के कारण बिना सोचे समझे कुछ भी सोचते विचारते रहते हैं । जिसका हमारे जीवन पर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ता है ।

विचार एक प्रकार का आंतरिक संवाद होता है , जिसे हम अपने आप से करते हैं । विचार करते समय हम जिन भावों का चयन करते हैं , उनका हमारे जीवन पर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ता है ; क्योंकि व्यक्ति जैसा सोचता है , वैसा ही बन जाता है । जिस तरह धनुष से तीर छोड़ा जाता है , उसी तरह मुख से निकले शब्दों के तीर भी वैसा ही प्रभाव डालते हैं ।

अशुभ भावनाओं से कहे गए शब्द अशुभ प्रभाव डालते हैं और ठीक वैसे ही अच्छी भावनाओं से कहे गए शब्द मनुष्य के जीवन को भी बदल कर रख देते हैं ।

हमारा जीवन चुनौतियों और संघर्षों से भरा हुआ है और अक्सर इन परिस्थितियों में हमें निराशा व हार का सामना करना पड़ जाता है , जिससे हम भावनात्मक रूप से कमजोर हो जाते हैं । मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि हमारा चेतन मन एक समय में एक ही तरह के विचारों को पकड़ता है ,

सकरात्मक सोच कैसे बनाये – Positive Kaise Soche

ये विचार सकारात्मक ( Positive Thinking In Hindi ) या नकारात्मक हो सकते हैं और जिस तरह के विचार मन में लंबे समय तक बने रहते हैं , वैसे ही हम बन जाते हैं । इसलिए मनोवैज्ञानिक निराशा के क्षणों में स्वयं से सकारात्मक संवाद करने पर जोर देते हैं ; क्योंकि सकारात्मक संवाद के समय उपजे सकारात्मक शब्द मन में निराशा के कारण उपजे अँधेरे को दूर करके आशाओं के द्वार खोलते हैं ।

  • आज का दिन काफी अच्छा है
  • वाह क्या बात है , आज मैंने सबसे अच्छा लिखा है
  • मुझे पता है , कि मैं बेस्ट हूँ

सकारात्मक सोच , सकारात्मक संवाद , सकारात्मक कार्य आदि बहुत ही महत्त्वपूर्ण शब्द हैं , जिन्हें समझना बहुत आवश्यक है । कुछ लोग सकारात्मकता के वास्तविक अर्थ को नहीं समझ पाते , जिसके कारण इसका लाभ नहीं उठा पाते , कुछ आलसी लोग सकारात्मकता को अकर्मण्यता का पर्याय समझते हैं और यह सोचकर ही संतुष्ट हो जाते हैं कि जो हो रहा है , वह अच्छा हो रहा है , वे न तो परिस्थिति को स्वीकारते हैं और न ही उससे निकलने का प्रयास करते हैं ; जबकि सकारात्मकता का वास्तविक अर्थ चुनौतियों व प्रतिकूलताओं में भी आशा की किरण को खोज लेना है , जिसके सहारे वह उन जटिल परिस्थितियों से बाहर आ सके । किसी जटिल से जटिल समस्या से न घबराकर उसे व्यावहारिक स्तर पर समाधान कर देने का नाम ही सकारात्मकता है । कुछ ऐसे तरीके हैं , जिनके माध्यम से हम स्वयं से सकारात्मक संवाद कर अपने जीवन को उन्नत बना सकते हैं ।

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अपने आप को मोटीवेट करे ( Motivate Yourself )

पहला तरीका यह है कि हम यह कहें कि ‘ हम जैसे भी हैं , स्वयं को हारने नहीं देंगे और किसी भी घटना पर रचनात्मक तरीके से अपनी प्रतिक्रिया देंगे । इसके लिए गहरी श्वास लें , विश्राम करें और यह सोचकर देखें कि इस पूरी प्रक्रिया में क्या अच्छा छिपा हो सकता है और इसके लिए स्वयं को मानसिक रूप से तैयार कर लें । जब किसी विषय में अच्छा सोचा जाता है तो इस दिशा में प्रयास करने में कुछ न कुछ अच्छी बातें मन में आ जाती हैं ।

जो हमें इस दिशा में कार्य करने के लिए मानसिक बल प्रदान करती हैं , लेकिन किसी विषय में गलत सोचने के लिए ज्यादा प्रयास नहीं करना पड़ता , थोड़े ही प्रयास से किसी भी विषय के नकारात्मक पहलू उभरने लगते हैं ,

इसका कारण यह है कि हमारा माहौल व वातावरण नकारात्मक तत्त्वों से भरा हुआ है और हमने भी वैसा ही सोचने का अभ्यास कर लिया है । इसलिए सकारात्मक सोचने का प्रयास व अभ्यास करना चाहिए ; क्योंकि सकारात्मक विचार व शब्द ही हमें सही दिशा में ले जा सकते हैं ।

नकरात्मक विचारो को अनदेखा करे – Ignore negative thoughts

दूसरा तरीका यह है कि हर समय हम स्वयं से सकारात्मक बातें करते हुए किसी नकारात्मक विचार को तटस्थता के साथ ग्रहण करें । जैसे ऐसा कहें कि ‘ मैं खुश हूँ ‘ ; ‘ मैं स्वस्थ हूँ ‘ ; ‘ मैं ऊर्जा से भरपूर हूँ । ‘ कभी कहें कि ‘ आज का दिन अच्छा है ‘ , ‘ मैं स्वयं को पसंद करता हूँ / करती हूँ ‘ : ‘ मुझे अपना काम अच्छा लगता है । ‘ और ऐसा कहते या सोचते समय मन में जो भी नकारात्मक विचार आएँ , उन्हें केवल देखें , अपनाएँ नहीं , केवल उन तत्त्वों से गुजर जाएँ ।

जिस तरह हमारे रास्ते में फूल , पत्थर , काँटे सभी पड़े होते हैं , लेकिन हम जान – बूझकर पत्थर व काँटों पर पैर नहीं रखते , उनसे बचकर , सँभलकर निकल जाते हैं , उसी प्रकार हमें नकारात्मक तत्त्वों से बचकर निकल जाना चाहिए और फूलों के सदृश सकारात्मक विचारों व शब्दों को अपनाना चाहिए ; क्योंकि जिन्हें भी हम अपनाते या स्वीकार करते हैं , वे हमारे अवचेतन मन में गहराई से उतरकर हमारे व्यक्तित्व का स्थायी हिस्सा बन जाते हैं ।

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चुनौतियों को बाहरी वस्तु समझे – Consider the challenges as an object

तीसरा तरीका यह है कि जीवन में मिलने वाली चुनौतियों को सदैव अस्थायी , वस्तुनिष्ठ और बाहरी कारक के रूप में स्वीकारें । किसी भी समस्या को एक अकेली घटना के रूप में देखें । अक्सर हम इन समस्याओं से जूझते हुए , इन पर अत्यधिक सोचते हुए इन्हें अन्य दूसरी घटनाओं से जोड़ने लगते हैं , जिसके कारण हम समस्याओं पर पूरी तरह से केंद्रित नहीं हो पाते और हमारी समस्याएँ भी अन्य तत्त्वों से जुड़ने के कारण विकराल रूप लेने लगती हैं और फिर इनका समाधान करना सरल नहीं होता । हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि जीवन की हर समस्या पर हमारा एक साथ नियंत्रण नहीं हो सकता । इसलिए एक समय में एक ही तरह की समस्या पर विचार करना चाहिए और समस्या का समाधान करते समय उससे जुड़े हुए अन्य पक्षों का भी ध्यान रखना चाहिए ।

विपतियो और चुनौतियों का सामना करे – Face adversities and challenges

चौथा तरीका यह है कि हम यह सोच रखें कि विपत्तियों और चुनौतियों का सामना करके ही सफलता हासिल की जा सकती है , इसलिए इन जटिल परिस्थितियों से घबराएँ नहीं और इनका दृढ़ता के साथ सामना करें ।

एक अच्छे और मजबूत व्यक्तित्व के लिए इन चुनौतियों से ऊपर उठना जरूरी होता है । चुनौतियों का सामना करके ही हमारा व्यक्तित्व व जीवन निखरता है , अनुभव व आत्मविश्वास बढ़ता है , इसलिए यह कभी न सोचें कि चुनौतियाँ हमारे मार्ग की रुकावट हैं , बल्कि यह सोचें कि ये एक पड़ाव हैं , जिन्हें हमें पार करना है और आगे बढ़ना है ।

ऐसा करने पर ही एक स्थिति ऐसी आएगी कि ये चुनौतियाँ हमारे लिए खेल के सदृश मनोरंजक व रोचक बन जाएँगी , फिर इनका सामना करने में भय नहीं लगेगा , बल्कि उत्साह जगेगा ; क्योंकि हर चुनौती का सामना होने पर हम और मजबूत बनते जाते हैं ।

खान पान पर ध्यान दे – Pay attention to food

पाँचवाँ तरीका यह है कि हम अपने सपनों व लक्ष्यों पर लगातार सोचते रहें ; क्योंकि ऐसा करने से हमें अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए पर्याप्त खान – पानी व पोषण मिलता है ।

जब हम किसी चीज के बारे में गहराई से सोचते हैं तो उससे संबंधित नए विचार व नए तरीके उभरकर आते हैं और हमारे स्वप्न व लक्ष्य को एक सुनिश्चित आकार मिलता है और हम सही दिशा में आगे बढ़ते हैं ।

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इसलिए यदि जीवन की भटकन से उबरना है और अपने इच्छित लक्ष्य तक पहुँचना है तो मन में उठने वाले नकारात्मक तत्त्वों को हटाना होगा और अपने अंदर की सकारात्मक रचनात्मकता को उभारना होगा ।

इसके अतिरिक्त अन्य भी कई तरीके हैं , जिनके माध्यम से हम स्वयं से सकारात्मक रूप से जुड़ सकते हैं और अपने जीवन को सँवार सकते हैं । बस , केवल हमें उन तरीकों के बारे में सोचकर उन्हें अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाना होगा , तभी हमारे जीवन में सार्थक परिवर्तन संभव हो सकेगा ।

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