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जातिवाद के पक्ष में दिए गए तर्कों के विरुद्ध लेखक डॉ ० भीमराव अंबडकर आपत्ति दर्ज करते हुए लिखते हैं कि- ” यह श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन ही नहीं करती बल्कि विभाजित वर्गों को एक दूसरे की अपेक्षा ऊँच – नीच भी करार देती है , जो कि विश्व के किसी भी समाज में नहीं पाया जाता है ।

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