विद्युत मोटर का नामांकित आरेख खींचिए। इसका सिद्धांत तथा कार्य विधि स्पष्ट कीजिए। विद्युत मोटर में विभक्त वलय का क्या महत्त्व है?

उत्तर : एक यंत्र जो विद्युत धारा को यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित कर सकता हो तो उसे विद्युत् मोटर कहते हैं। सिद्धांत-जब अनेक कुंडलियों से युक्त धारा का संवहन करती एक आयताकार कुंडली को शक्तिशाली क्षेत्र में रखा जाता है तो यह यांत्रिक बल का कार्य करती हुई निरंतर घूमती है। यह सिद्धांत पूर्ण रूप से गैल्वनोमीटर तथा अन्य विद्युत उपकरणों की तरह कार्य करता है। यह फ्लेमिंग के बायें हाथ सिद्धांत पर आधारित है।

रचना-विद्युत मोटर के निम्नलिखित भाग हैं-

(i) केंद्रक (Core)– यह नर्म लोहे का बना सिलेंडर है जिसे एक धुरे पर लगाया जाता है। धुरा सरलता से घूम सकने वाली बॉल-बियरिंग पर टिका होता है। इसके एक तरफ शेफ्ट लगा होता है जो शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र को उत्पन्न करने का कार्य करता है जब इसके चारों ओर की कुंडली से धारा प्रवाहित की जाती है।

(ii) कुंडली (Coil)– नर्म लोहे के टुकड़े को केंद्र मान कर उस पर तांबे की तार को अनेक बार लपेट कर कुंडली बनाई जाती है जिसे चित्र में ABCD के रूप में दिखाया गया है। इसका कार्य विद्युत क्षेत्र को बनाना है। इसमें से विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है।

(iii) कॉम्यूटेटर (Commutator)-दो बंटी हुए S1 और S2 मुद्रिकाएं कॉम्यूटेटर को प्रदर्शित करती हैं। इनके सिरों को कुंडली के साथ जोड़ दिया जाता है। इसके बीचो-बीच से धुरा गुज़रता है। इसका कार्य प्रत्येक अर्ध चक्र के बाद विद्युत धारा की दिशा को बदलना है।

(iv) ब्रश (Brushes)-B1 और B2 कार्बन या गनमैटल के बने हुए ब्रुश हैं जो कड़ियों S1 और S2 के साथ मज़बूती से संबंध बनाए रखते हैं। घूमती हुई कुंडली को निरंतर विद्युत् धारा प्रवाहित कराते रहना इनका कार्य है।

(v) अवतल बेलनाकार चुंबक (Concave Cylindrical Magnet)-कुंडली को अवतल बेलनाकार चुंबक के बीच में रखा जाता है। इसका कार्य शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र को बनाना है ताकि यांत्रिक ऊर्जा की प्राप्ति की जा सके।

(vi) बैटरी (Battery)-दिष्ट विद्युत् धारा (D.C.) या अनेक सैलों की बैटरी को शक्ति स्रोत के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। इसका कार्य कुंडली को धारा प्रदान करना है।

कार्य (Working)-जब ABCD कुंडली क्षैतिज स्थिति में अवतल सिलंडरीकल चंबकों के बीच में होती है तो चुंबकीय क्षेत्र कुंडली के समांतर होता है। जब कुंडली में से विद्युत धारा गुज़ारते हैं तो

चुंबकीय क्षेत्र को उत्पन्न करता है जो कुंडली के तल के साथ समकोण बनाता है। कुंडली चुंबकीय जोड़े के प्रभाव से घूम जाती है। फ्लेमिंग के बायें हाथ के नियम के अनुसार AB खंड ऊपर की ओर घूमेगा। कुंडली के खंड CD में विद्युत धारा C से D और चुंबकीय क्षेत्र उत्तर से दक्षिण की ओर घूमता है। CD नीचे की ओर गति करेगा। दो बराबर और परस्पर विरोधी शक्तियां कुंडली पर घड़ी की सूई की दिशा (Clock wise) कार्य करती हैं और उसे घुमाती हैं। जैसे ही कुंडली 90° पर घूमती है इसका चुंबकीय क्षेत्र अवतल बेलनाकार चुंबक के चुंबकीय क्षेत्र के समांतर हो जाता है जिस कारण यह रुक जाता है पर संवेग के कारण यह अपना चक्कर पूरा कर लेता है जब तक कि यह 180° पूरा नहीं कर लेता।

कड़ी S1 180° के बाद कॉम्यूटेटर के ब्रश B2 के साथ जुड़ती है और कड़ी S2 ब्रश B1 से अलग हो जाती है। इससे कुंडली में CDAB से BADC धारा की दिशा का प्रत्यावर्तन हो जाता है।

इस प्रकार कुंडली निरंतर घड़ी की सूई की दिशा में घूमने लगती है।

विद्युत मोटर में विभक्त वलय दिक्परिवर्तक का कार्य करता है। यह परिपथ में विद्युत्धारा के प्रवाह को उत्क्रमित करने में सहायता देता है। विद्युत्धारा के उत्क्रमित होने पर दोनों भुजाओं पर आरोपित बलों की दिशाएं भी उत्क्रमित हो जाती हैं। कुंडली की पहली भुजा को पहले नीचे धकेली गई थी वह ऊपर धकेली जाती है और ऊपर वाली भुजा नीचे धकेल दी जाती है। प्रत्येक आधे घूर्णन के बाद यह क्रम दोहराया जाता है और कुंडली और धुरी का लगातार घूर्णन होता रहता है।