Raksha Bandhan Par Nibandh Hindi Mein | रक्षा बंधन पर निबंध हिंदी में

Raksha Bandhan Par Nibandh Hindi Mein | रक्षा बंधन पर निबंध हिंदी में

Raksha Bandhan Par Nibandh Hindi Mein |

रक्षा बंधन पर निबंध for Class 5 Hindi

रक्षा बंधन पर निबंध हिंदी में – भारतीय त्योहारों में रक्षा – बन्धन का अपना विशिष्ट महत्त्व है । इस त्योहार के दिन बहन अपने भाई के दाहिने कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती हैं जिसे ‘ राखी ‘ कहा जाता है । यह त्योहार श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है । भारत में रक्षा – बन्धन का उत्सव मनाने की परम्परा प्राचीन काल से चली आ रही है । अपने पुत्र की रक्षा हेतु बलि की मां ने उसके दाहिने कलाई पर अभिमंत्रित रक्षा – सूत्र बांधी थी । यह परम्परा कुछ उसी समय से शुरुआत हुई और मध्य काल तक आई । इस काल में रक्षा सूत्र बन्धन का विपुल मात्रा में प्रचार – प्रसार हो गया था । भारतवर्ष के सभी निवासी इस पर्व की महत्ता को स्वीकार कर चुके थे । बहादुर शाह जफ़र के आक्रमण से अपनी प्रजा और राज्य की रक्षा के लिए कर्णावती ने दिल्ली के सुलतान हुमायूं को इस त्योहार के दिन भाई – बहन का प्यार स्वरूप पवित्र राखी भेजी थी । हुमायूं इस राखी को स्वीकार करते हुए कर्णावती की रक्षा भी की थी । इस पर्व का महत्त्व इन दृष्टान्तों से सिद्ध हो जाता है । ऐसे ही वर्तमान समय में भी यह त्योहार अति लोकप्रिय है । रक्षा – बन्धन त्योहार की परम्परा का सम्बन्ध कभी ब्राह्मणों से भी रहा है । आज भी ब्राह्मण लोग अपने यजमान को रक्षा – सूत्र बांधकर दक्षिणा लेते हैं । इस त्योहार के आते ही बहनें उमंग से भर जाती हैं । चाहे कहीं भी हों अपने भाई के पास अवश्य पहुँचती हैं । इस दिन बहन भाई के माथे पर तिलक लगाकर , रंग – बिरंगी राखियां बांधने के पश्चात् मिठाई खिलाती हैं । बहनें अपने भाई की लम्बी जीवन की कामना करते हुए कलाई पर रक्षा – सूत्र बांधती हैं । यह सूत्र भाई – बहन के प्यार का प्रतीक है । यह बड़ा ही महत्वपूर्ण और पवित्र पर्व है । इस पर्व से अनेक सामाजिक और साम्प्रदायिक सम्बन्ध दृढ़ हो सकते हैं ।

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रक्षाबंधन पर निबंध 2021

येन बद्धो बली राजा , दानवेन्द्रो महाबलः । तेन त्वामपि बध्नामि , रक्षे मा चल मा चल ।।

अर्थात् रक्षा के जिन सूत्रों से शक्तिशाली बलि राजा को बाँधा गया था उन्हीं धागों से मैं तुम्हें बाँधता हूँ । हे रक्षा के सूत्रो , तुम भी विचलित न होना । सचमुच रक्षा के सूत्र बड़े बलशाली होते हैं । वे सूत्र , बाँधनेवाले और बंधानेवाले को प्रेम के पवित्र बन्धन में बाँध देते हैं । बहन भाई की कलाई पर इस भावना से प्रेरित होकर राखी बाँधती है कि उसकी यह राखी अक्षय कवच बनकर जीवन मरण के घात – प्रत्याघातों से उसके भाई की रक्षा करे और भाई , उस रक्षणार्थिनी बहन को वचन देता है कि वह शरीर में बूंद – भर रक्त रहने तक भी अपनी बहन के मान – सम्मान की रक्षा करेगा ।

भाई – बहन के पवित्र त्याग एवं प्रेम का यह त्योहार श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है । राखी , सलौनी और श्रावणी इस रक्षा – बन्धन के अन्य नाम हैं । इस राष्ट्रव्यापी पारिवारिक पर्व को मनाने की परम्परा प्राचीनकाल से अब तक अविच्छिन्न रूप से चली आ रही है । रक्षा – बन्धन की परम्परा के बारे में जनश्रुति है कि एक बार देव – दानव – युद्ध हुआ । देवता पराजित होने लगे और दानवों का संघर्ष तीव्र से तीव्रतर होगा गया । उस समय इन्द्र की पत्नी शची ने पति की विजय एवं मंगल – कामना से उनकी कलाई पर रक्षा – सूत्र बाँधा । कहते हैं कि इसके प्रभाव से इन्द्र को विजय – श्री प्राप्त हुई । तभी से सभी ने रक्षा के इन सूत्रों का महत्त्व निर्विवाद रूप से स्वीकार कर लिया ।

एक ऐतिहासिक घटना के अनुसार मेवाड़ की वीरांगना कर्मवती ने अपनी सहायता के लिए सम्राट हुमायूँ को राखी भेजी थी । मुस्लिम होकर भी हुमायूँ ने हिन्दू – बहन की राखी का जो सम्मान किया उससे न केवल भारतीय इतिहास में एक गौरवपूर्ण गाथा अंकित हुई , बल्कि हिन्दू – मुस्लिम एकता को बल मिला , और यह भी सिद्ध हो गया कि प्रेम का पवित्र बन्धन धर्म और माता – पिता के पार्थिव बन्धनों से ऊँचा होता है । रक्षा – बन्धन के शुभ अवसर पर हाट – बाजार रंग – बिरंगी राखियों से पट जाते हैं । रक्षा – बन्धन के दिन बहन प्रातःकाल भाई के मस्तक पर चावल और कुमकुम का टीका लगा कर हाथ में राखी बाँधती है । राखी बंधवाते ही भाई , बहन की रक्षा का भार अपने ऊपर ले लेता है । बहन खुशी से नाच उठती है । इस अवसर पर ब्राह्मण लोग घर – घर जाकर अपने यजमानों को राखी बाँधते हैं और दक्षिणा प्राप्त करते हैं ।

आज के इस अर्थ – प्रधान युग में राखी का पवित्र भावनात्मक मूल्य भी द्रव्य में आँका जाता है और भाई बदले में कुछ रुपये देकर उत्तरदायित्व से मुक्त हो जाता है । यह बड़ी हीन भावना है । कहाँ बहन का निर्व्याज स्नेह ! और , कहाँ चाँदी के चंद टुकड़े ! हमें इस त्योहार का मूल्य धन से कभी आँकना नहीं चाहिए । किसी ने ठीक ही कहा है ” बहन तुम्हारी इस राखी का , मूल्य भला क्या दे पाऊँगा ! केवल एक इशारे पर मैं , बहन सदा बलि – बलि जाऊँगा !